धनबाद: 'किस्त' चुकाने की जद्दोजहद और प्रशासनिक भ्रष्टाचार ने ली एक और जान, मासूमों के सिर से उठा पिता का साया

धनबाद: 'किस्त' चुकाने की जद्दोजहद और प्रशासनिक भ्रष्टाचार ने ली एक और जान, मासूमों के सिर से उठा पिता का साया

The struggle to repay loan installments and administrative

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कतरास (धनबाद)। राजगंज थाना क्षेत्र के दलुडीह पंचायत अंतर्गत सरायदाहा में मंगलवार तड़के हुई ट्रैक्टर दुर्घटना महज एक हादसा नहीं, बल्कि उस प्रशासनिक भ्रष्टाचार की बलि है जो चंद सिक्कों के लिए रात के अंधेरे में सड़क पर मौत को दौड़ने का लाइसेंस देता है।

नींद की एक मामूली झपकी ने न सिर्फ एक चालक की सांसें नहीं छीन लीं, बल्कि उस पूरे तंत्र को बेनकाब कर दिया है जो बालू के इस खूनी कारोबार पर आंखें मूंद कर बैठा है।

सबसे बड़ा सवाल, थानों के गेट से गुजरता है 'मौत का काफिला'

बताया जाता है कि रात के सन्नाटे में अवैध बालू लदी गाड़ियां एक-दो नहीं, बल्कि करीब आधा दर्जन से अधिक थानों के मुख्य गेट के सामने से बेरोकटोक गुजरती हैं। इसके बावजूद इन थानों के अफसर और गश्ती दल का मौन रहना कई गंभीर संदेह पैदा करता है।

यदि इन थानों के सामने चेकिंग की जरा भी मुस्तैदी दिखाई जाती, तो शायद संतोष जैसे मजदूर को किस्त चुकाने के लिए अपनी जान जोखिम में डालकर रातों की नींद हराम नहीं करनी पड़ती।

 

थकान बनी काल, खामोश रास्तों पर यमराज बनकर दौड़ रहा था बालू

स्थानीय सूत्रों से मिली जानकारी के अनुसार, बिशनपुर निवासी 31 वर्षीय संतोष केवट की मौत थकान और सरकारी तंत्र की बेरुखी का भयावह नतीजा है। बताया जाता है कि पूरी रात सड़कों पर बालू के अवैध परिवहन का खेल बदस्तूर जारी है। तड़के करीब दो बजे जब संतोष बालू खाली कर लौट रहा था। तब थकान काल बनकर उनके सिर पर सवार हो गई।

कहा जा रहा है कि सरायदाहा के पास झपकी आते ही अनियंत्रित ट्रैक्टर खेत में पलट गया और चालक उसके नीचे जिंदा दब गया। काफ़ी देर तक चालू इंजन की आवाज सन्नाटे को चीरती रही, लेकिन जब तक लोग मौके पर पहुंचे, संतोष की देह बेजान हो चुकी थी।

दो मासूमों के सिर से उठा साया, कर्ज की किस्त बनी 'फांस'

महज तीन माह पहले फाइनेंस कराए गए ट्रैक्टर से संतोष अपने दो मासूम बच्चों का भविष्य संवारने का सपना देख रहे थे। उन्हें क्या पता था कि जिस ट्रैक्टर की किस्त भरने के लिए वे रातों की नींद हराम कर रहे हैं, वही उनके बच्चों को अनाथ कर देगा। आज संतोष के घर में मातम है, लेकिन इस मौत के असल गुनहगार वे अधिकारी है जो कानून की धज्जियां उड़ते देख भी मौन हैं शायद अभी भी गहरी नींद में हैं।

जांच की खानापूर्ति और सुलगता रोष

पुलिस ने शव को पोस्टमार्टम के लिए भेज दिया है, लेकिन बड़ा सवाल यह है कि क्या इस 'प्रशासनिक हत्या' की जवाबदेही तय होगी? या फिर एक गरीब की मौत को 'दुर्घटना' का नाम देकर फाइल बंद कर दी जाएगी? क्षेत्र के तमाम लोग इस वक्त गहरा रोष व्यक्त कर रहे हैं और दोषियों पर कार्रवाई की मांग कर रहे हैं।